Temple info -3828. Dhumeshwar Mahadev Temple, Gwalior தூமேஷ்வர் மகாதேவ் கோயில், க்வாலியர்

 Temple info -3828

கோயில் தகவல்-3828


 

Dhumeshwar Mahadev Temple, Gwalior


Located a few kilometers from Bhitarwar, the ancient Dhumeshwar Mahadev Temple holds within it numerous historical legends. It is said that the *Pindi* (sacred stone symbol of Lord Shiva) originated from the Sindh River; historians believe that the *Pindi* enshrined in the temple emerged from within the river itself.


Situated just 70 km from the Gwalior district headquarters in Madhya Pradesh, the Dhumeshwar Temple has long been a center of faith for millions. The massive *Shivling* enshrined within the temple is truly magnificent. The artistry of this temple, which dates back thousands of years, remains a sight to behold. Built with exquisite craftsmanship and architecture, this temple dedicated to Lord Mahadev retains its beauty to this day.


Devotees from far and wide visit Dhumeshwar Dham throughout the year to offer prayers. Pilgrims come not only from the Gwalior-Chambal region but also from various states across the country to seek blessings and have their wishes fulfilled. Huge crowds of devotees flock to the temple on occasions such as the holy month of Shravan and Somvati Amavasya. A grand fair is organized at the temple during the festival of Mahashivratri.


**Why is it known as Dhumeshwar?**

As the Sindh River flows near the Dabra-Bhitarwar route, it encounters a rocky terrain. Here, the river water rushes through a narrow passage and cascades down rapidly like a waterfall. This impact creates a mist or spray—specifically, the high-speed collision of the water stream against the rocks generates fine water droplets. In the local dialect of the past, this mist or spray was referred to as *'Dhoom'*.


The *Shivling* enshrined in the temple's sanctum sanctorum emerged from the depths of the Sindh River. Because the river water cascades down from a great height, the impact creates a rising mist that resembles smoke. It appears as though this massive waterfall has been performing the *Abhishek* (ritual bathing) of Lord Mahadev on its own since time immemorial. Thus, due to the water falling from such a height, the *Shivling* came to be known as Dhumeshwar Mahadev. On the other hand, there is also a belief linking the temple's naming to the sage Dhaumya.


**History of the Temple**

Historians believe that this temple is thousands of years old, having undergone reconstruction and renovation by various dynasties at different times.


The temple's Mahant and Mahamandaleshwar, Shri Shri 1008 Aniruddha Van Ji Maharaj, states that the temple was originally built during the era of the Nagvanshi kings. In ancient times, the Dhumeshwar Mahadev Temple was constructed under the name 'Kalpriyanath'.


In the latter half of the 13th century, Bahauddin Ghiyasuddin Balban—a *Naib-e-Mamlikat* (deputy ruler) of the Delhi Sultanate and a ruthless Islamic invader—demolished the temple during his invasions of Narwar and Gwalior. Later, Raja Veer Singh Dev of Orchha (reigning from 1605 to 1627) had the Dhumeshwar Temple rebuilt.


However, during the final decade of the 17th century, the temple once again fell victim to Islamic brutality during an invasion by Aurangzeb. It remained in a dilapidated state for several years thereafter. Yet, in the 18th century, under the leadership of the great Maratha warrior-commander Shrimant Maharaj Madhavrao (also known as Mahadji Shinde), the flame of Hindutva was rekindled within the dormant Hindu populace; this led to a revival of Hindutva in the region and the blossoming of a new consciousness within Hindu society. Subsequently, the ruined Dhumeshwar Mahadev Temple was reconstructed.


In the latter half of the 19th century, the Maharaja of Gwalior, Shrimant Jayajirao Scindia, gave the temple its magnificent form. The Dhumeshwar Temple continued to receive appropriate patronage from the Gwalior State during the reigns of the subsequent rulers, Shrimant Madhav Maharaj and Shrimant Jivajirao Scindia.


A census report prepared in 1901 during the Scindia era recorded the local population at merely 16 individuals—comprising 5 women and 11 men. The temple is also mentioned in the Gwalior State Gazette published in 1908. Upon assuming the reins of power in 1936, the last Maharaja of Gwalior, Shrimant Jivajirao Scindia, once again undertook the renovation of the Dhumeshwar Mahadev Temple.


The temple was constructed using the interlocking technique prevalent at the time. It stands approximately 35 feet high, with a width of about 20 feet and a length of around 50 feet. It is a magnificent example of ancient Indian architecture. The great Sanskrit scholar Bhavabhuti has also made reference to this temple.


भितरवार से कुछ किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन धूमेश्वर महादेव मंदिर अनेकों ऐतिहासिक गाथायें संजोए हुए हैं। पिंडी का उदगम सिंध नदी से होना बताया जाता है। इतिहासकारों का ऐसा मानना है, कि मंदिर में विराजित भगवान शिव की जो पिंडी है, वह नदी के अंदर से निकली है।

मध्य प्रदेश में ग्वालियर जिला मुख्यालय से केवल 70 किमी की दूरी पर बना धूमेश्वर मंदिर सदा से ही लाखों लोगों की आस्था का केंद्र रहा है। मंदिर में विराजित विशाल शिवलिंग बहुत ही अद्भुत है। हजारों वर्ष पुराने इस मंदिर की कलात्मकता आज भी देखने लायक है। बेहतर कारीगरी और वास्तुकला से बनाया गया महादेव जी का यह मंदिर आज भी पहले की तरह ही सुन्दर लगता है।

यहाँ वर्ष भर दूर-दूर से भक्तगण धूमेश्वर धाम पर दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। केवल ग्वालियर-चंबल संभाग ही नहीं, अपितु देश के अनेक राज्यों से भी श्रद्धालु अपनी मनोकाना पूर्ति हेतु यहां दर्शन व पूजन करने आते हैं। श्रावण मास और सोमवती अमावस्या जैसे अवसरों पर मंदिर में श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है। महाशिवरात्रि पर्व पर तो मंदिर पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है।

क्यों जाना जाता है धूमेश्वर के नाम से

सिन्ध नदी अपने प्रवास के दौरान जब डबरा-भितरवार मार्ग के समीप से हो कर गुजरती है। यहाँ पर चट्टानी क्षेत्र होने की वजह से सिंध  नदी का जल काफी सँकरे रास्ते से होकर बड़ी तेज गति से झरने के रूप में नीचे गिरता है। इस कारण से तुषार उठता है मतलब तेज गति से जल धारा के चट्टान पर गिरने से जलकण उत्पन्न होते है, इसे ही खड़ी बोली में पहले के समय में धूम कहा जाता था।

मंदिर के गर्भगृह में विराजमान शिवलिंग सिंध नदी के गर्भ से निकला था। चूँकि सिंध नदी का जल काफी ऊंचाई से जलप्रपात के रूप में नीचे गिरता है, इसीलिए जल के नीचे गिरने से धुआँ जैसा उठता है। और ऐसा लगता है जैसे यह विशाल झरना महादेव जी का अभिषेक अनंतकाल से स्वयं ही करता आ रहा हो। अतः ऊंचाई से पानी गिरने के कारण इस शिवलिंग का नाम धूमेश्वर महादेव पड़ा।

वहीं दूसरी और एक मान्यता यह भी है कि धौम्य नामक महर्षि की भी जनश्रुतियाँ इस मन्दिर के नामकरण के साथ जुडी हुई हैं।

मंदिर का इतिहास

इतिहासकारों का मत है कि यह मंदिर हजारों साल पुराना है, जिसका पुनर्निर्माण तथा जीर्णोद्धार अलग-अलग समय पर अनेक राजवंशों द्वारा कराया जाता रहा है।

मंदिर के महंत व महामंडलेश्वर श्री श्री 1008 अनिरुद्ध वन जी महाराज बताते हैं, कि यह मंदिर पहले नागवंशीय राजाओं के समय में बनाया गया था। धूमेश्वर महादेव मन्दिर प्राचीन समय में कालप्रियनाथ के नाम से बनवाया गया था।

क्रूर इस्लामी आक्रान्ता दिल्ली सल्तनत के नायब-ए-मामलिकत बहाउद्दीन गयासुद्दीन बलबन ने तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में नरवर  और ग्वालियर पर किये गए आक्रमण के समय इसको ध्वस्त कर दिया। फिर ओरछा नरेश वीर सिंह देव (Raja Veer Singh Bundela Of Orchha) ने बाद में अपने शासनकाल (सन 1605-1627) के दौरान धूमेश्वर मंदिर का दुबारा निर्माण कराया।

परन्तु 17वीं शताब्दी के आखिरी दशक में औरंगजेब के आक्रमण में यह मन्दिर, फिर इस्लामी क्रूरता का शिकार हुआ। इसके बाद कुछ सालों तक यह इसी तरह भग्नावस्था में पड़ा रहा, परन्तु 18वीं शताब्दी में मराठा सैन्याधिपति महायोद्धा श्रीमंत महाराज माधवराव (उपाख्य महादजी शिन्दे) के नेत्तृत्व में बुझे हुए हिन्दू जनमानस में हिन्दुत्त्व की ज्वाला पुनः प्रदीप्त हुई, और हिन्दुत्त्व का पुनर्रुद्धार इस क्षेत्र में हुआ तथा हिन्दू समाज में नवीन जनचेतना प्रस्फुटित हुई। इसके उपरान्त इस खण्डित पड़े हुए धूमेश्वर महादेव मन्दिर का पुनः पुनर्निर्माण कराया गया।

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ग्वालियर महाराज श्रीमंत जयाजीराव सिंधिया ने मन्दिर को भव्य स्वरूप प्रदान किया। और इसके बाद के राजाओं श्रीमंत माधव महाराज एवं श्रीमंत जीवाजीराव सिंधिया के शासनकाल में भी ग्वालियर रियासत से धूमेश्वर मन्दिर को यथोचित संरक्षण प्राप्त होता रहा। 

श्रीमंत सिंधिया के समय में सन 1901 में इसकी सेंसस रिपोर्ट बनवाई गई थी, तब यहाँ की कुल जनसंख्या मात्र 16 लोगों की थी। जिसमें 5 महिलाएँ और 11 पुरुष थे। सन 1908 में ग्वालियर रियासत के प्रकाशित हुए राजपत्र (गजेट) में भी मन्दिर का उल्लेख है। ग्वालियर के अन्तिम महाराज श्रीमंत जीवाजीराव सिंधिया जी ने सन 1936 में शासनसूत्र सम्हालते ही एक बार फिर धूमेश्वर महादेव मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया।

इस मन्दिर के निर्माण में तात्कालिक अन्तर्ग्रथन तकनीक का उपयोग किया गया है। भूमि से इसकी ऊँचाई लगभग 35 फीट है, चौड़ाई लगभग 20 फीट एवं लम्बाई लगभग 50 फीट है। यह प्राचीन भारतीय वास्तुकला का अद्भुत उदहारण है। संस्कृत के महान विद्वान् भवभूति ने भी इस मन्दिर का उल्लेख किया है।

தூமேஷ்வர் மகாதேவ் கோயில்,குவாலியர்

பிதர்வாரிலிருந்து சில கிலோமீட்டர் தொலைவில் அமைந்துள்ள பழமையான தூமேஷ்வர் மகாதேவ் கோயில், எண்ணற்ற வரலாற்று நிகழ்வுகளைக் கொண்டுள்ளது. இங்குள்ள பிண்டியின் தோற்றம் சிந்து நதியிலிருந்து உருவானதாகக் கூறப்படுகிறது. கோயிலில் பிரதிஷ்டை செய்யப்பட்டுள்ள சிவபெருமானின் பிண்டி, அந்த நதியிலிருந்து தோன்றியதாக வரலாற்றாசிரியர்கள் நம்புகிறார்கள்.


மத்தியப் பிரதேசத்தில் உள்ள குவாலியர் மாவட்டத் தலைமையகத்திலிருந்து வெறும் 70 கிலோமீட்டர் தொலைவில் அமைந்துள்ள தூமேஷ்வர் கோயில், எப்போதுமே லட்சக்கணக்கான மக்களின் நம்பிக்கை மையமாக இருந்து வருகிறது. கோயிலில் பிரதிஷ்டை செய்யப்பட்டுள்ள பிரம்மாண்டமான சிவலிங்கம் குறிப்பிடத்தக்கது. ஆயிரக்கணக்கான ஆண்டுகள் பழமையான இந்தக் கோயிலின் கலைத்திறன் இன்றும் கண்டு ரசிக்கத்தக்கதாக உள்ளது. நேர்த்தியான கைவினைத்திறன் மற்றும் கட்டிடக்கலையுடன் கட்டப்பட்ட இந்த சிவபெருமான் கோயில், இன்றும் என்றும் போல் அழகாகக் காட்சியளிக்கிறது.


ஆண்டு முழுவதும் தொலைதூரங்களில் இருந்தும் பக்தர்கள் தூமேஷ்வர் தாமுக்கு வருகிறார்கள். குவாலியர்-சம்பல் பிரிவிலிருந்து மட்டுமல்லாமல், நாடு முழுவதிலும் உள்ள பல மாநிலங்களில் இருந்தும் பக்தர்கள் இங்கு வந்து தரிசனம் பெறவும், தங்கள் விருப்பங்கள் நிறைவேற வழிபடவும் வருகிறார்கள். சிராவண மாதம் மற்றும் சோமவதி அமாவாசை போன்ற நாட்களில், இக்கோயிலுக்கு ஏராளமான பக்தர்கள் வருகிறார்கள். மகாசிவராத்திரி அன்று கோவிலில் ஒரு பெரிய திருவிழா நடைபெறுகிறது.


இது ஏன் தூமேஷ்வர் என்று அழைக்கப்படுகிறது?


சிந்து நதி அதன் பயணத்தின் போது டாப்ரா-பிதர்வார் சாலைக்கு அருகில் செல்கிறது. இங்குள்ள பாறை நிறைந்த நிலப்பரப்பின் காரணமாக, சிந்து நதியின் நீர் ஒரு மிகக் குறுகிய பாதையில் மிக வேகமாக நீர்வீழ்ச்சி வடிவில் விழுகிறது. இது பனியை உருவாக்குகிறது, அதாவது நீரின் வேகமான ஓட்டம் பாறைகளில் விழும்போது நீர்த்துளிகளை உருவாக்குகிறது. முற்காலத்தில் கரிபோலியில் இது 'தூம்' என்று அழைக்கப்பட்டது.


கோவிலின் கருவறையில் அமைந்துள்ள சிவலிங்கம், சிந்து நதியின் கருப்பையிலிருந்து தோன்றியது. சிந்து நதியின் நீர் பெரும் உயரத்தில் இருந்து விழுவதால், அது விழும்போது புகை போன்ற தோற்றத்தை உருவாக்குகிறது. இந்த மாபெரும் நீர்வீழ்ச்சி நித்திய காலமாக சிவபெருமானுக்கு அபிஷேகம் செய்து வருவது போல் தோன்றுகிறது. எனவே, இவ்வளவு உயரத்தில் இருந்து நீர் விழுவதால், இந்த சிவலிங்கத்திற்கு தூமேஷ்வர் மகாதேவ் என்று பெயரிடப்பட்டது.


மறுபுறம், தௌம்யா என்ற முனிவரைப் பற்றிய புராணக்கதைகளும் இந்தக் கோயிலின் பெயருடன் தொடர்புடையவை என்ற நம்பிக்கையும் உள்ளது.


கோயிலின் வரலாறு

பல்வேறு காலங்களில் வெவ்வேறு வம்சங்களால் மீண்டும் கட்டப்பட்டு, புதுப்பிக்கப்பட்ட இந்தக் கோயில், ஆயிரக்கணக்கான ஆண்டுகள் பழமையானது என்று வரலாற்றாசிரியர்கள் நம்புகிறார்கள்.


கோயிலின் மஹந்த் மற்றும் மகாமண்டலேஷ்வரான ஸ்ரீ ஸ்ரீ 1008 அனிருத்த வன் ஜி மகாராஜ், இந்தக் கோயில் முதன்முதலில் நாக வம்ச மன்னர்களின் ஆட்சிக்காலத்தில் கட்டப்பட்டது என்று கூறுகிறார். தூமேஷ்வர் மகாதேவ் கோயில் முதலில் கல்பிரியநாத் என்ற பெயரில் கட்டப்பட்டது.


பதின்மூன்றாம் நூற்றாண்டின் பிற்பகுதியில், டெல்லி சுல்தானியத்தின் பிரதிநிதியான, கொடூரமான இஸ்லாமியப் படையெடுப்பாளர் பகவுதீன் கியாசுதீன் பால்பன், நார்வார் மற்றும் குவாலியர் மீதான தனது படையெடுப்பின் போது இதை அழித்தார். பின்னர், ஓர்ச்சாவின் மன்னர் வீர் சிங் தேவ் தனது ஆட்சிக்காலத்தில் (1605-1627) தூமேஷ்வர் கோயிலை மீண்டும் கட்டினார்.


இருப்பினும், 17 ஆம் நூற்றாண்டின் கடைசி தசாப்தத்தில் அவுரங்கசீப்பின் படையெடுப்பின் போது, ​​இக்கோயில் மீண்டும் இஸ்லாமிய கொடுமைகளுக்கு இரையானது. அதன்பிறகு பல ஆண்டுகள் அது இடிபாடுகளாகவே இருந்தது. ஆயினும், 18 ஆம் நூற்றாண்டில், மராட்டிய தளபதியும் மாபெரும் வீரருமான ஸ்ரீமந்த் மகாராஜ் மாதவராவ் (என்கிற மகாத்ஜி ஷிண்டே) அவர்களின் தலைமையில், இந்து உணர்வில் இந்துத்துவத்தின் சுடர் மீண்டும் பற்றவைக்கப்பட்டது. இது அப்பகுதியில் இந்துத்துவத்தின் மறுமலர்ச்சிக்கும், இந்து சமூகத்தில் ஒரு புதுப்பிக்கப்பட்ட பொது உணர்வுக்கும் வழிவகுத்தது. அதைத் தொடர்ந்து, பாழடைந்த தூமேஷ்வர் மகாதேவ் கோயில் மீண்டும் கட்டப்பட்டது.


19 ஆம் நூற்றாண்டின் பிற்பகுதியில், குவாலியர் மகாராஜா ஸ்ரீமந்த் ஜெயஜிராவ் சிந்தியா இக்கோயிலுக்கு ஒரு பிரம்மாண்டமான தோற்றத்தை அளித்தார். மேலும், அவருக்குப் பின் வந்த மன்னர்களான ஸ்ரீமந்த் மாதவ் மகாராஜ் மற்றும் ஸ்ரீமந்த் ஜிவாஜிராவ் சிந்தியா ஆகியோரின் ஆட்சிக்காலத்தில், தூமேஷ்வர் கோயில் குவாலியர் அரசிடமிருந்து உரிய ஆதரவைத் தொடர்ந்து பெற்று வந்தது.


1901-ஆம் ஆண்டில் ஸ்ரீமந்த் சிந்தியாவின் ஆட்சிக்காலத்தில் நடத்தப்பட்ட ஒரு மக்கள்தொகைக் கணக்கெடுப்பு அறிக்கையின்படி, 5 பெண்கள் மற்றும் 11 ஆண்கள் உட்பட மொத்த மக்கள் தொகை 16 மட்டுமே இருந்தது. இக்கோயில் 1908-ஆம் ஆண்டு குவாலியர் மாநில அரசிதழிலும் குறிப்பிடப்பட்டுள்ளது. 1936-ல் ஆட்சிக்கு வந்த குவாலியரின் கடைசி மகாராஜாவான ஸ்ரீமந்த் ஜிவாஜிராவ் சிந்தியா, தூமேஷ்வர் மகாதேவ் கோயிலை மீண்டும் புதுப்பித்தார்.


இக்கோயிலின் கட்டுமானமானது, சமகாலத்தில் பயன்படுத்தப்படும் ஒன்றோடொன்று கோர்க்கும் நுட்பத்தைப் பயன்படுத்துகிறது. தரையிலிருந்து இதன் உயரம் சுமார் 35 அடி, அகலம் சுமார் 20 அடி மற்றும் நீளம் சுமார் 50 அடி ஆகும். இது பண்டைய இந்தியக் கட்டிடக்கலையின் ஒரு குறிப்பிடத்தக்க எடுத்துக்காட்டாகும். மாபெரும் சமஸ்கிருத அறிஞரான பவபூதியும் இக்கோயிலைக் குறிப்பிட்டுள்ளார்.

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